अभिव्यक्ति : कुछ अनकही सी (abhivyaktibyrcgaur) मेरी बात ,(रचना - 21, कागज की नाव) मोबाइल और इंटरनेट के दौर में, कब बारिश आ कर चली जाती हैं, कागज की नाव और वो बचपन की बारिश, अब ढूंढे से भी नहीं मिलती, कि खो गया सा है अब बचपन कही…
Read moreअभिव्यक्ति : कुछ अनकही सी (abhivyaktibyrcgaur) मेरी बात, (रचना -20, अच्छे दिन) नोटबंदी और देशप्रेम की घुट्टी पी कर, लोकतंत्र के साथ - साथ राजतंत्र के, दर्शन तो करता चल, मंहगाई की सुरसा का ग्रास तो बनता चल, ताली और थाली सब बजा कर …
Read moreअभिव्यक्ति : कुछ अनकही सी (abhivyaktibyrcgaur) मेरी बात(रचना - 19, GDP - सकल/कुल घरेलू उत्पाद) वर्तमान में जी डी पी चर्चा का विषय है।देश में इसे ले कर हाय - तौबा मची हुई है। जो अर्थशास्त्र नहीं जानते वो भी इसे लेकर बड़ी - बड़ी बा…
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